एक चर्चित रियलिटी शो, M.TV ROADIES में इनदिनों प्रतियोगियों को राजस्थान के प्रसिद्ध हिल स्टेशन, माउंट आबू के दर्शन कराए जा रहें हैं। या यूं कहें कि उनकी प्रतियोगिता अब वही चल रही है। अगर आपने शो देखा होगा तो आसानी समझ आ ही गया होगा कि माउंट आबू पर्यटकों को इतना लोकप्रिय क्यों है। अरावली पहाड़ियों के बीच बनी नक्खी झील, ऐतिहासिक (और अद्वितीय) दिलवाड़ा जैन मंदिर, ब्रह्मकुमारी आश्रम का हेडक्वार्टर, सन-सेट प्वाइंट (सूर्यास्त दर्शन स्थल), गुरु शिखर (राजस्थान और अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊंची पहाड़ी) और हनीमून प्वाइंट पर्यटकों को अपनी और अनायास ही खींच लेती है। राजस्थान-गुजरात बार्डर पर बना ये छोटा सा हिल स्टेशन इतना खूबसूरत हो सकता है ये मुझे वहां जाकर ही पता चला। कुछ दिन पहले ही मैं भी अपनी पत्नी के साथ छुट्टी मनाने माउंट आबू गया था। जितने भी पर्यटक स्थल मैने अभी बतायें हैं वो सभी मुझे वहां जाने से पहले भी पता थे।
जिस हेरिटज होटल (केसर भवन पैलेस) में हम ठहरे थे वहां के जनरल-मैनेजर से मेरी जान-पहचान हो गई थी। उन्हें जैसे ही पता चला कि मैं राजपूत हूं, वे बोल उठे, “अगर आप राजपूत है तो गऊ-मुख जरुर घूम कर आईए।” मैने पूछा, वो क्या है ? जबाब देने से पहले जीएम साहब ने एक सवाल और दाग दिया कि मैं कौन सा राजपूत हूं। मैने बताया कि मै चौहान राजपूत हूं। उन्होंने बताया, “चौहान राजपूतों की उत्पत्ति गऊ(या 'गौ') मुख आश्रम में ही तो हुई थी।” जीएम साहब ने बताया कि गौ-मुख में ही महर्षि वशिष्ठ का प्राचीन आश्रम है जहां उन्होने अग्निकुल यज्ञ किया था और राजपूतों की उत्पत्ति हुई थी। उनके इतना कहते ही मेरे अंदर बसा इतिहास का छात्र जाग उठा। याद आया कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी।
चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल वंश से ही तो हुई थी। इतिहासकार कर्नल टॉड ने अपनी किताब Annals and Antiquities of Rajasthan में राजपूतों की उत्पत्ति इसी अग्निकुल यज्ञ से बताई थी। 12वीं सदी में लिखी गई चंदबरदाई की पृथ्वीराज रासो में भी इस यज्ञ का वर्णन है। इतिहास की पढ़ाई के वक्त सब रटा था, लेकिन अब ध्यान नहीं रहा था कि अग्निकुल यज्ञ इसी जगह हुआ था। मैने उन्हें बताया कि हम वहां जरुर जायेंगे। लेकिन उन्होंने पहले ही आगाह कर दिया कि वहां ध्यान से जायेंगा, “खतरनाक जगह है।”जिस टैक्सी ड्राइवर ने हमे पूरा माउंट आबू घूमाया था, जब मैने उससे गऊमुख(गौमुख)चलने के लिये कहा तो वो चौंक गया। बहानें बनानें लगा, “सर वहां मत जाइए... जगंली रास्ता है... कोई नहीं जाता वहां... सैकड़ों सीढ़ियां चढनी-उतरनी पड़ेंगी।” कहने लगा, वहां आदिवासी भी रहतें है, अकेला देखकर लूट लेते हैं। मैंने पूछा आदिवासी ? जी सर, वे राजाओं की अवैध संतान होती थी, जन्म के बाद उन्हे यहां छोड़ दिया जाता था। उनकी आंखे सुनहरी होती है। लेकिन हम ठान चुके थे, वही जायेंगे। आखिरकार ड्राइवर को मानना पड़ा, लेकिन बोला कि सर मैं आपको बाहर ही छोड़ दूंगा, आपके साथ आश्रम नहीं जाऊंगा।
माउंट आबू शहर से तीन-चार किलोमीटर की दूरी पर है वशिष्ठ आश्रम। लोग इसे गौमुख के नाम से जानते है। सामने ही बोर्ड लगा था, उसपर पूरे आश्रम का इतिहास और राजपूतों की उत्पत्ति का वर्णन था। जिस जगह टैक्सी ने हमें छोड़ा था वहां से हमें खाई में 750 सीढ़ियां उतरनी थी (लौटने पर इतनी ही चढ़नी थी)। कुछ कदम ही चले थे कि एक परिवार आता दिखाई दिया। हमें देखकर वो सभी मुस्करायें और कहा “हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं।” मैंने पूछा कि क्या वे सभी बीच रास्ते से ही लौट आये हैं, तो उन्होंने कहा कि इतने खतरनाक जंगली रास्ते पर अकेले जाना ठीक नहीं है। मेरी पत्नी को अब कुछ शंका होने लगी, बोली कि वहां जाना सुरक्षित है ? मैने कहा, डरो नहीं चलो। वाकई हम दोंनों के और एक नये नवेले पति-पत्नी के जोड़े के सिवा हमें रास्ते में कोई नहीं मिला। रास्ता बेहद खतरनाक था। लिखा हुआ था, "जंगली जानवरों से सावधान।" लेकिन जब हम वहां पहुंचे तो वहां का नजारा देखते ही बनाता था। बेहद शांत और रमणीक दृश्य था वहां का। आश्रम के बाहर ही एक पवित्र कुंड है। एक गाय के मुख से उस कुंड में लगातार जल गिर रहा था। उस कुंड के पास ही एक स्थानीय शख्स बैठा था। उसने बताया था कि ये पवित्र सरस्वती की धारा है और बारह महीनें जल की धारा ऐसी ही चलती रहती है। ये धारा कभी बंद नहीं हुई है। “बड़े-बड़े इंजीनियर भी आजतक इस जल का स्त्रोत्र पता नहीं कर पाए। 
आश्रम के अंदर भगवान राम का मंदिर है। रामायण में बताया गया है कि इक्ष्वाकु वंश (जिसके राम वंशज थे) के गुरु महर्षि वशिष्ठ ही थे। वशिष्ठ ऋषि के पास ही नंदिनी गाय थी जिसे छीनने के लिये राजा विश्वामित्र (बाद में महर्षि) ने उनसे युद्ध किया था। महाभारत में भी जिक्र है कि नारद मुनि ने धर्मराज युधिष्ठर को अरबुदाचल पर्वत की तीर्थ-यात्रा करने का निर्देश दिया था
। पुराण और शास्त्रों के मुताबिक अरबुदाचल पर्वत हिमालय का पुत्र था और महर्षि वशिष्ठ के आग्रह पर हिमालय ने अपने पुत्र को यहां भेज दिया था। शायद यही वजह है कि रेगिस्तान में भी पर्वत श्रृंखला खड़ी हो गई। बाद में इसी अरबुदाचल पर्वत को लोग आबू के नाम से जानने लगे। मध्यकालीन युग में ये जगह अगर राजाओं के लिये पवित्र तीर्थ-स्थल था तो ब्रिटिश काल में ये जगह राजस्थान के छोटे-बड़े राजाओं और अंग्रेज अफसरों के लिये गर्मियां बिताने की खास जगह। माउंट आबू में राजस्थान के हर राज-घरानें का महल है जिन्हे अब हेरिटज होटलों में तब्दील कर दिया गया है। जिस केसर भवन पैलेस में हम ठहरें थे, वो कभी सिरोही राजाओं का महल था। माउंट आबू, राजस्थान के सिरोही जिले का ही हिस्सा है। भगवान राम के मंदिर के बाहर ही है पवित्र अग्निकुंड। मंदिर और आश्रम के एक केयर-टेकर ने बताया कि इसी यज्ञकुंड से ही चार राजपूत जातियों की उत्पत्ति हुई थी। जब भारतवर्ष में चारों तरफ मार-काट मची थी, अशांति फैली हुई थी, कानून का कोई राज नहीं था, कोई चक्रवर्ती राजा नहीं बचा था, तब महर्षि वशिष्ठ नें महायज्ञ किया था। अग्नि की स्तुति करके सबसे पहले देवराज इंद्र की पूजा की। यज्ञ करते समय अग्नि में से तलवार लियें एक पराक्रमी निकला। वो परमार वंश का संस्थापक बना। उसके बाद भगवान विष्णु का आह्ववाहन किया गया तो उसमें से चौहान वंश का संस्थापक निकला। इसी तरह से भगवान शिव से सोलंकी और ब्रह्मा से प्रतिहारों की उत्पत्ति हुई। इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी।
इन चार वंशो ने ही फिर पूरे भारतवर्ष में लंबे समय तक राज किया और समाज में फैल रही अराजकता को समाप्त किया। महर्षि वशिष्ठ नें इन चारों पराक्रमी युद्ववीरों को राजाओं की संतान यानि ‘राजपूत’ की संज्ञा दी। आधुनिक इतिहासकार राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुल यज्ञ के बाद से तो मानते हैं लेकिन इस बात पर यकीन नहीं करते कि चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार अग्नि से उत्पन्न हुए हैं। इतिहासकार इस यज्ञ को एक तरह के शुद्धिकरण की तौर पर देखते है। पहली बात तो अगर हजारों साल पहले भगवान राम के समय में भी वशिष्ठ मुनि थे, तो वे क्या सैकड़ो साल तक वे जिंदा रहें इस यज्ञ को करने के लिये। इसका जबाब शायद ये है कि ऋषि मुनियों में गुरु-शिष्य पंरपरा चलती थी। एक ऋषि की मौत के बाद उसका एक शिष्य गुरु की गद्दी पर आसीन होता था और उसे भी अपनी गुरु की भांति वही नाम मिल जाता था। इतिहासकार, महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ को मध्ययुग के नवी-दसवी काल में देखते है। ये वो समय था जब भारत में अरबों ने आक्रमण करना शुरु कर दिया था। गुप्तवंश के राजाओं और हर्षवर्धन के बाद पूरे देश में कोई पराक्रमी राजा ना बचा था। ये वही वक्त था जब महमूद गजनी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत को लूटता हुआ पश्चिमी मुहाने पर बने प्राचीन सोमनाथ मंदिर तक पहुंच गया था। उसने वहां लूटपाट और तबाही का वो मंजर खेला था कि आज भी लोग सुनकर सिहर उठते हैं। हिंदु समाज में लोगो की रक्षा करने वाले क्षत्रियों का पतन तेजी से हो रहा था। पहले वैश्य राजा (गुप्त वंश) और फिर हुण और शक राजाओं (उन्हें नीची जाति का माना जाता था) के हाथों सत्ता चले जाने से ब्राहमण और क्षत्रिय समाज परेशान था। शायद इसका ही नतीजा था अग्निकुल यज्ञ। इस यज्ञ के बाद पूरे उत्तर भारत में चौहान, सोलंकी, परमार और प्रतिहार वंश का ही राज हो गया। प्राचीन आश्रम के द्वार पर ही मध्यकालीन युग के कुछ शिलालेख रखें हुए हैं, जिनसे पता चलता है कि राजाओं ने दान स्वरुप कई गांव इसी आश्रम को दियें थें। जो मंदिर आज के स्वरुप में खड़ा है वो भी सन् 1394 में बनाया गया था।
करीब दो घंटे आश्रम में बितानें के बाद जैसे ही हम बाहर निकले हमने देखा कि चार-पांच संदिग्ध लोग वहां टहल रहें थे। मैने गौर से देखा तो एक शख्स की आंख सुनहरी थी-होटल के जीएम और ड्राइवर की बात याद आ गई। मेरी पत्नी ने मुझे अलर्ट रहने का इशारा किया। वो समझ गई थी कि कुछ गड़बड़ है, उसे शायद खतरे का एहसास हो गया था (क्राइम रिपोर्टर जो है)। मुझे भी खतरें का अंदेशा तो था लेकिन मैं इसलिये चुप था कि कही मेरी पत्नी डर ना जायें। लेकिन इससे पहले कि वो चार-पांच लोग कुछ कर पाते या कुछ प्लानिंग कर पाते, मैं उनके पास पहुंच गया। पूछा, “ यही के रहने वाले हो क्या ?” ये सुनते ही वे सभी सकपका गये। कहने लगें, नहीं साहब हम गुजरात से आये है। मैने रोबदार आवाज में पूछा, “ गुजरात में कहां?” इतना कहते ही वे सभी बगलें झाकनें लगे। लेकिन हमारा काम हो गया था। मै समझ गया कि आश्रम से लौटते हुए सुनसान जंगली रास्ते पर वे अब हमें नहीं टकरायेंगे। अब मेरी समझ में आ गया था कि माउंट आबू के दर्शनीय स्थलों में गौमुख और वशिष्ठ आश्रम का नाम क्यों नहीं है। खैर, हम 750 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच चुके थे। वहां ड्राइवर खड़ा इंतजार कर रहा था। उसने पूछा, सर कोई दिक्कत तो नहीं हुई ? मैने कहा नहीं। शायद जो थोड़ी बहुत दिक्कत या परेशानी हमने झेली थी वो गौमुख के दर्शन मात्र के सामने बहुत छोटी जो थी।
11 टिप्पणियां:
मन प्रसन्न करा दिया आपने!
ऑफिस जाने की जल्दी हो रही है इसलिए लेख सरसरी तौर पर ही पढ़ा है ! बुकमार्क कर लिया है शाम को फुर्सत में पढ़कर कमेन्ट करूँगा |
bahut silselwar dhang se aap ne yah vivran diya hai.kafi kuchh samjh aa gaya.picture bhi manbhavan hain.
dhnywaad.
सुबह जल्दबाजी में आपका ये लेख नही पढ़ पाया था | बहुत अच्छी जानकारी दी आपने,मेरा भी दो बार माउंट आबू जाना हुआ था लेकिन इस स्थान के बारे में पता ही नही चला इसलिए न जाने का मलाल ही रह गया | दूसरी बार तो एक स्थानीय व्यक्ति भी साथ थे लेकिन उन्होंने ने भी इस स्थान का जिक्र नही किया वरना जरुर जाते |
राजपूतो का इतिहास पढ़ कर आनन्द आया या कहे गर्व महसूस हुआ . अग्निवंशी हो आप इसलिए अपने उदगम तक पहुच गये . कभी और वंशो पर भी रौशनी डालिए
mai is par aek khabr kar chuka hun dhrm ke liye aaj tak par "raam ka gurkul" ..
राजपूत का इतिहास पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई. हम भी प्रतिहार राजपूत है इसलिए हमें तो बहुत ही ज्यादा ठीक लगा भविष्य में हम वह जायेंगे. इतनी अच्छी जानकारी के लिए कोटि-२ धन्यवाद
राजपूत का इतिहास पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई. हम भी प्रतिहार राजपूत है इसलिए हमें तो बहुत ही ज्यादा ठीक लगा भविष्य में हम वह जायेंगे. इतनी अच्छी जानकारी के लिए कोटि-२ धन्यवाद
संजीव कुमार सिंह
jaha tak mera manna hai achacha likha hai
क्या परमार हि अब पवार कहलाते हैं पवार वशं के बारे में भी लिखें।
क्या परमार हि अब पवार कहलातें है पवार वशं के बारे में भी लिखें ।
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